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शनिवार, 15 मार्च 2014

“मिष्ठान नही हम खाते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

1806mawa248 
मधुमेह हुआ जबसे हमको, 
मिष्ठान नही हम खाते हैं।
बरफी-लड्डू के चित्र देखकर,
अपने मन को बहलाते हैं।।

 Dal_Bhat_Tarkari,Nepal
आलू, चावल और रसगुल्ले,
खाने को मन ललचाता है,
हम जीभ फिराकर होठों पर,
आँखों को स्वाद चखाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।।

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गुड़ की डेली मुख में रखकर,
हम रोज रात को सोते थे,
बीते जीवन के वो लम्हें,
बचपन की याद दिलाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

हर सामग्री का जीवन में,
कोटा निर्धारित होता है,
उपभोग किया ज्यादा खाकर,
अब जीवन भर पछताते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

थोड़ा-थोड़ा खाते रहते तो,
जीवन भर खा सकते थे,
पेड़ा और बालूशाही को,
हम देख-देख ललचाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

हमने खाया मन-तन भरके,
अब शिक्षा जग को देते हैं,
खाना मीठा पर कम खाना,
हम दुनिया को समझाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।
 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया ..होली की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ! होली की हार्दिक शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत उम्दा प्रस्तुति...!
    होली की हार्दिक शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. फिर भी आपको होली की मीठी शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. और कुछ खाइये याना खाइये---गुजिया अवश्य खाइये.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    --
    आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (03-03-2014) को ''होली आई रे आई होली आई रे '' (चर्चा मंच-1554) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!

    उत्तर देंहटाएं

  7. बहुत सुन्दर सशक्त सन्देश :

    हर सामग्री का जीवन में,
    कोटा निर्धारित होता है,
    उपभोग किया ज्यादा खाकर,
    अब जीवन भर पछताते हैं।
    मधुमेह हुआ जबसे हमको,
    मिष्ठान नही हम खाते हैं।

    जीवन शैली रोग मधुमेह का मर्म समझाती रचना

    उत्तर देंहटाएं

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