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गुरुवार, 20 मार्च 2014

"दिल तो है मतवाला बादल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
मोम कभी हो जाता है, तो पत्थर भी बन जाता है।
दिल तो है मतवाला बादल, “रूप” बदलता जाता है।।

कभी किसी की नहीं मानता,
प्रतिबन्धों को नहीं जानता।
भरता है बिन पंख उड़ानें,
जगह-जगह की ख़ाक छानता।
वही काम करता है यह, जो इसके मन को भाता है।
दिल तो है मतवाला बादल, “रूप” बदलता जाता है।।

अच्छे लगते अभिनव नाते,
करता प्रेम-प्रीत की बातें।
झोली होती कभी न खाली
सबके लिए भरी सौगातें।
तन को रखता सदा सुवासित, चंचल सुमन कहाता है।
दिल तो है मतवाला बादल, “रूप” बदलता जाता है।।

पौध सींचता सम्बन्धों की,
रीत निभाता अनुबन्धों की।
मीठे पानी के सागर को,
नहीं जरूरत तटबन्धों की।
बाँध तोड़ देता है सारे, जब रसधार बहाता है।
दिल तो है मतवाला बादल, “रूप” बदलता जाता है।। 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बाँध तोड़ देता है सारे, जब रसधार बहाता है।
    दिल तो है मतवाला गिरगिट,“रूप”बदलता जाता है।।

    बहुत खूब ! सुंदर रचना...!

    RECENT POST - प्यार में दर्द है.

    उत्तर देंहटाएं

  2. पौध सींचता सम्बन्धों की,
    रीत निभाता अनुबन्धों की।
    मीठे पानी के सागर को,
    नहीं जरूरत तटबन्धों की।
    बाँध तोड़ देता है सारे, जब रसधार बहाता है।
    दिल तो है मतवाला गिरगिट, “रूप” बदलता जाता है।।
    दिल तो है मतवाला बादल रूप बदलता जाता है अच्छी रचना गिरगिट का रंग बदलना नकारात्मक भाव की सृष्टि करता है बादल होता है उपकारी ,गिरगिट होता नेता है

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा आपने आदरणीय वीरेन्द्र कुमार शर्मा जी...

    उत्तर देंहटाएं

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