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बुधवार, 26 मार्च 2014

"गीत-आशाएँ मुस्काती हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खेतों में बिरुओं पर जब, बालियाँ सुहानी आती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

सोंधी-सोंधी महक उड़ रही गाँवों के गलियारों में,
रंगों की बौछार हो रही आँगन में, चौबारों में,
बैशाखी-होली की खुशियाँ घर-घर में छा जाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

सूरज पर यौवन आया है, शीतलता का अन्त हुआ,
उपवन-कानन खिला हुआ है, चारों ओर बसन्त हुआ,
झूम-झूमकर नवकोपलियाँ मन्द समीर बहाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

हँसतीं हैं बुराँश की कलियाँ, काफल “रूप” दिखाता है,
सुन्दर पंख हिलाती तितली, भँवरा राग सुनाता है
शुक-कोकिल मस्ती में भरकर, अपने सुर में गाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

आम-नीम बौराये फिर से, जामुन भी बौराया है,
मधुमक्खी ने अपना छत्ता, फिर से नया बनाया है,
नीड़ बनाने को चिड़ियाएँ, तिनके चुन-चुन लाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-03-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. अहा. आपसे कोई विषय-वस्तु छूटेगा नहीं. शानदार..

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रकृति मुस्कराये तो मन प्रसन्न हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रकृति का मनोहारी रूप.
    बहुत सुंदर.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर सशक्त अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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