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गुरुवार, 27 मार्च 2014

"ग़ज़ल-शासन चलाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
वर्तमान परिपेक्ष्य में
एक पुरानी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ।
हम गधे इस देश के हैंघास खाना जानते हैं।
लात भूतों के सहजता सेनहीं कुछ मानते हैं।।

मुफ्त का खाया हमॆशाकोठियों में बैठकर.
भाषणों से खेत मेंफसलें उगाना जानते हैं।

कृष्ण की मुरली चुराईगोपियों के वास्ते,
रात-दिन हमरासलीला को रचाना जानते हैं।

राम से रहमान कोहमने लड़ाया आजतक,
हम मज़हव की आड़ मेंरोटी पकाना जानते हैं।

देशभक्तों को किया हैबन्द हमने जेल में,
गीदड़ों की फौज सेशासन चलाना जानते हैं।

सभ्यता की ओढ़ चादरआ गये बहुरूपिये,
छद्मरूपी रूप” सेदौलत कमाना जानते हैं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेवाकी से लाज़वाब / एक बेहतरीन प्रवाहमय रचना रच डाली आपने आदरणीय सर।
    हर एक अश'आर बेहद लाज़वाब। बधाई

    एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: ''कोई न सुनता,'अभी' जो बे-सहारे हैं''

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही अच्छा व्यंग्य है ! आज के राजनीतिज्ञों का क्या कहें ! पता नहीं ये किस लायक हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपने भाईयों को देखा दिल खुश खुश हो गया :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या बात है शास्त्रीजी ..लाज़बाव .....

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी आपने गधों की पोल खोल दी ! दुलत्ती तो अपने आप पड़ गई ! लाजवाब ..
    लेटेस्ट पोस्ट कुछ मुक्तक !

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजनीति के शातिरों पे व्यंग्य बाण ,

    खुलके चलाना जानते हैं ,

    हम गधे हैं देश के ,खुद को लुटाना जानते हैं शास्त्री जी आज पूरे रंग में हैं :चुनावी बाण लिए हैं


    "ग़ज़ल-शासन चलाना जानते हैं"

    उच्चारण

    उत्तर देंहटाएं

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