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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

दोहे "खिली सुहानी धूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कुहरा छाया है घना, नहीं शीत का अन्त।
इतनी शीतल भोर में, कैसे खिले बसन्त।।
सूरज में बढ़ने लगी, जैसे-जैसे आग।
किरणें उगती देखकर, गया कुहासा भाग।।
सूरज ने दिखला दिया, अपना अनुपम रूप।
शीतलता मिटने लगी, खिली सुहानी धूप।।
जीवनदाता सूर्य को, कोटि-कोटि परनाम।
सुख वरसाना आपका, नित्य नियम का काम।।
--
गिरह और नक्षत्र के, होते भिन्न उसूल।
समय सुहाना हो अगर, सब होता अनुकूल।।
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सबको होती लालसा, मिले कभी सम्मान।
विरले ही रचते सदा, दोहे ललित-ललाम।।

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