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शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

"बनाओ मन को कोमल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

महावृक्ष है यह सेमल का,
खिली हुई है डाली-डाली।
हरे-हरे फूलों के मुँह पर,
छाई है बसन्त की लाली।।
पाई है कुन्दन कुसुमों ने
कुमुद-कमलिनी जैसी काया।
सबसे पहले सेमल ने ही 
धरती पर ऋतुराज सजाया।।
सर्दी के कारण जब तन में,
शीत-वात का रोग सताता।
सेमलडोढे की सब्जी से,
दर्द अंग का है मिट जाता।।
जब बसन्त पर यौवन आता,
तब ये खुल कर मुस्काते हैं।
भँवरे इनको देख-देखकर,
मन में हर्षित हो जाते हैं।।
सुमन लगे हैं अब मुर्झाने,
वासन्ती अवसान हो रहा।
तब इन पर फलियाँ-फल आये,
गर्मी का अनुमान हो रहा।।
गर्म हवाओं के आते ही,
चटक उठीं सेंमल की फलियाँ।
रूई उड़ने लगी गगन में,
 हुईँ रेशमी वन की गलियाँ।। 

फूलों-फलो और मुस्काओ,
सीख यही देता है सेंमल।
तन से रहो सुडोल हमेशा,
किन्तु बनाओ मन को कोमल।।

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