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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

दोहे "हँसता हरसिंगार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करने में उपकार को, नहीं मानता हार।
बाँट रहा है गन्ध को, सबको हर सिंगार।।
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केसरिया टीका लगा, हँसता हरसिंगार।
अमल-धवल ये सुमन है, , कुदरत का उपहार।।
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नतमस्तक होकर सदा, करता है मनुहार।
धरती पर बिखरा हुआ, लुटा रहा है प्यार।।
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वैद्यराज के रूप में, हरता सबके रोग।
वातव्याधि को दूर कर, करता बदन निरोग।।
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कलम बना कर डाल की, मिट्टी में दो गाड़।
नित्य नेह से सींचिए, उग जायेगा झाड़।।
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माटी कैसी भी रहे, नहीं इसे परहेज।
बिरुआ हरसिंगार का, रखना सदा सहेज।।
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कुछ वर्षों के बाद में, तन इसका गदराय।
पौधा हरसिंगार का, महावृक्ष बन जाय।।
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सबके मन को मोहते, सुन्दर-सुन्दर फूल।
पादप की नित-नियम से, सदा सींचना मूल।।
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शस्यश्यामला धरा पर, करना यह उपकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का सिंगार।। 


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