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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

दोहे "नैसर्गिक शृंगार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सरदी सूखी ही गयी, नहीं हुई बरसात।
फसलें अब भी झेलतीं, पाले का उत्पात।।
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आवारा मौसम हुए, हुआ बसन्त उदास।
उपवन में कैसे बुझे, भँवरों की अब प्यास।।
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अभी नहीं मधुमास में, चहके सुमन पलाश।
बेर-बेल में आयेगी, कैसे भला मिठास।।
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सकते में हैं लोग सब, कैसे सुधरें हाल।
सरदी में सूखे पड़े, झील, सरोवर-ताल।।
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मानवता के महल की, दहल रही दहलीज।
वैसी फसलें काट लो, बोये जैसे बीज।।
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बदले जीवन ढंग हैं, बदले रस्म-रिवाज।
ओढ़ सभ्यता पश्चिमी, हुआ असभ्य समाज।।
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बचा हुआ है आज भी, रिश्तों का संसार।
माताओं की लोरियाँ, बहनों का वो प्यार।।
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नकली अब मुस्कान है, नकली हैं उपहार।
फिर कैसे मिल पायेगा, नैसर्गिक शृंगार।।

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