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सोमवार, 11 जुलाई 2016

अकविता "आजादी का तोहफा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शेरा के छोले
एक आने में
भरकर दोना  
अब शेरा तो रहा नहीं
उसका बेटा
10 रुपये में  बेच रहा है
सिर्फ आधा दोना
इतने पर भी
उसके हैं
कठिन गुजारे
और नेताओं के
हो रहे हैं वारे-न्यारे
आजादी का तोहफा
50 साल की उपलब्धियाँ
500 गुनी मँहगाई  
खुशहाली के बदले
तबाही ही तबाही
लोकतन्त्र का अर्थ
खुदगर्जी
जनता की अर्जी
शासन की मर्जी
पिता होता था प्रजा का
राजशाही में राजा
मगर लोकशाही ने
जनता का
बजा दिया है बाजा
चारों ओर
लूटमार, अफरा-तफरी  
यही तो है  
प्रजातन्त्र का रूप
नेताओं की तफरी 

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