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बुधवार, 13 जुलाई 2016

दोहे "भारत देश महान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेले से लाता नहीं, चिमटा आज हमीद।
हथियारों के साथ अब, मना रहा है ईद।।
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खून-खराबे का चला, रमजानों में दौर।
आयत पर कुरआन की, नहीं किसी का गौर।।
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दहशत फैलाने चले, मजहब की ले आड़।
मुसलमान इसलाम को, खुद ही रहे पछाड़।।
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मुसलमान जब देश में, खेलें खूनी खेल।
भाई-भाई में भला, कैसे हो फिर मेल।।
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मुसलमान पर उँगलियाँ, उठती चारों ओर।
मानवता की आज तो, टूट रही है डोर।।
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हिन्दू-सिख-ईसाइ सब, करते अंगीकार।
मुसलमान का विश्व में, खिसक रहा आधार।।
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बिगड़ा अब भी कुछ नहीं, बचा लीजिए शाख।
पत्थर को ज्वालामुखी, कर देता है राख।।
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भगवा बहुत उदार है, भगवे में हैं सन्त।
भगवा नाइंसाफ का, कर देता है अन्त।।
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चाल-चलन ईमान के, होते हैं कुछ ढंग।
जप-तप, पूजा-वन्दना, मानवता के अंग।।
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देश विभाजन के समय, मिला नाम था पाक।
अपनी हरकत से हुआ, पाक आज नापाक।।
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भूल गया इंसान अब, रब के नेक उसूल।
कारगुजारी देखकर, आहत हुआ रसूल।।
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बेमन से होते जहाँ, रोजे और नमाज।
अपने मुसलिम देश की, सोचो जरा नवाज।।
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आजादी हर पन्थ को, ऐसा हिन्दुस्तान।
इसीलिए है जगत में, भारत देश महान।।

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