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शनिवार, 30 जुलाई 2016

ग़ज़ल "छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुझे तो छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता।
सही मतला, सही मक़्ता, लगाना भी नहीं आता।।

दिलों के बलबलों को मैं, भला अल्फ़ाज़ कैसे दूँ,  
मुझे लफ्ज़ों का गुलदस्ता, सजाना भी नहीं आता।

सुहाने साज मुझको, प्यार से आवाज़ देते हैं,
मगर मजबूर हूँ, इनको बजाना भी नहीं आता।

भरा है प्यार का सागर, मैं कैसे जाम में ढालूँ,
भरी गागर से पानी, मुझको छलकाना नहीं आता।

महकता है-चहकता है, ये ग़ुलशन खिलखिलाता है,
मुझे क्यारी में जल की धार, टपकाना नहीं आता।

ढला जब रूप” तो, कोई फिदा कैसे भला होगा,
मुखौटा माँज-धोकर, मुझको चमकाना नहीं आता।

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