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रविवार, 24 जुलाई 2016

गीत "रेत के घरौंदे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सज रहे हैं ख्वाब,
जैसे हों घरौंदे रेत में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

मोम के सुन्दर मुखौटे,
पहन कर निकले सभी,
बदल लेते रूप अपना,
धूप जब निकली कभी,
अब हुए थाली के बैंगन,
थे कभी जो खेत में। 
बाढ़, बारिश-हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

हो रही वादाख़िलाफी,
रो रहे सम्बन्ध हैं,
हाट का रुख़ देखकर ही,
हो रहे अनुबन्ध हैं,
नज़र में कुछ और है,
कुछ और ही है पेट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

जो स्वयं अज्ञान है,
वो क्या परोसेगा हुनर,
बेहया की लाज को,
ढक पाएगी कैसे चुनर,
जिग़र में जो कुछ भरा है,
वही देगा भेंट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

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