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सोमवार, 4 जुलाई 2016

दोहे "पागल बनते लोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पागलपन में हो गयी, वाणी भी स्वच्छन्द।
लेकिन इसमें भी कहीं, होगा कुछ आनन्द।।
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पागलपन में सभी कुछ, होता बिल्कुल माफ।
पागल को मिलता नहीं, कहीं कभी इंसाफ।।
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मजा समझ कर पी रहा, पागल गम के घूँट।
आता नहीं पहाड़ के, नीचे उसका ऊँट।।
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ऐसा पागलपन भला, जिसमें हो लालित्य।
नित्य-नियम से बाँटता, सबको सुख आदित्य।।
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दुनिया में होती अलग, पागल की पहचान।
समाधान करता नहीं, इसका अनुसंधान।।
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पागल का तो पूछता, कोई नहीं मिजाज।
सिर्फ दिखावे के लिए, करते लोग इलाज।।
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न्यायालय में भी बढ़ा, पागलपन का रोग।
अपने स्वारथ के लिए, पागल बनते लोग।।।
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इस असार संसार में, बिखरे कितने रंग।
आकुल मेरा मन हुआ, देख जगत के ढंग।।
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राजनीति का खा रहे, पुत्र-पौत्र-दामाद।
धर्म-प्रान्त का जात का, बढ़ा हुआ उन्माद।।
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दर्पण गुरू समान है, मूरत होता शिष्य।
जैसी होगी कल्पना, वैसा बने भविष्य।।
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गुरू-शिष्य पागल हुए, ज्ञान हुआ विकलांग।
नहीं भरोसा कर्म पर, बाँच रहे पंचांग।।
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राजनीति का खा रहे, पुत्र-पौत्र-दामाद।
धर्म-प्रान्त का जात का, बढ़ा हुआ उन्माद।।

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