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रविवार, 31 जुलाई 2016

ग़ज़ल "मन को न हार देना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना।

सावन की घन-घटाएँ, बरसे बिना न रहतीं,
बारिश की मार से तुम, मन को न हार देना।

इठला रहे हैं अब तो, नाले-नदी-गधेरे,
गर हो सके तो इनसे, मस्ती उधार लेना।

धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते,
करके निराई इनका, आँचल सँवार देना।

अब झूम-झूम भँवरे, गुंजार कर रहे हैं,
तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना।

चढ़ती हुई नदी का, तो रूप मस्त होता,
तुम ज़लज़लों से अपना, यौवन उबार लेना।

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