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मंगलवार, 9 मई 2017

विविध दोहावली "करो पाक को ढेर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बालक रखते हो जहाँ, हाथों में पिस्तौल।
उस जन्नत की धरा का, बिगड़ गया माहौल।।
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माना दिल्ली को नहीं, रुचा केजरीवाल।
नहीं हुआ लेकिन कहीं, ऐसा कभी कमाल।।
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भगवा का रथ रोक कर, करा दिया आभास।
खारे पानी में दिखी, सबको वहाँ मिठास।।
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भगवावेशी जानते, साम-दाम का खेल।
राहुल-माया-मुलायम, को भेजेंगे जेल।।
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ममता-समता का नहीं, अधिक दिनों का खेल।
करके जोड़-जुगाड़ को, तुड़वा देंगे मेल।।
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चौपट पंजा कर दिया, ले गाँधी का अस्त्र।
तन पर नहीं विपक्ष के, होंगे साबुत वस्त्र।।
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अपना कुरता फाड़कर, दिखा रहे युवराज।
पलक झपकते छिन गया, मनमोहन का ताज।।
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माना होते देश में, कुछ विकास के काम।
मगर पड़ोसी देश पर, कूटनीति नाकाम।।
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सदमा सैनिक झेलते, सीमा पर दिन-रात।
लेकिन शासक कर रहे, चिकनी-चुपड़ी बात।।
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समय बीतता जा रहा, और करो मत देर।
जन-मानस अब चाहता, करो पाक को ढेर।।
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जो शासक सुनता नहीं, जन-गण की आवाज।
छिन जाता है शीश से, उसका सुन्दर ताज।।
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हर-हर, घर-घर आ गया, जनमत मिला अपार।
बार-बार मिलता नहीं, जीवन में उपहार।।
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अपने भारत देश में, हो समान कानून।
माटी में खिलने लगें, महके हुए प्रसून।।

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