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शनिवार, 13 मई 2017

ग़ज़ल "सँवरना न परिन्दों" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों 
मंजिल को हँसी-खेल समझना न परिन्दों 

आगे कदम बढ़ाना ज़रा देख-भाल कर 
काँटों से तुम कभी भी उलझना न परिन्दों 

भोले कबूतरों के लिए ज़ाल हैं बिछे 
लालच की उस जमीं पे उतरना न परिन्दों 

आजकल के आदमी, शैतान हो गये 
भरकर चटक-लिबास, सँवरना न परिन्दों  

अब मीत-मीत का ही गला काट रहे हैं 
यूँ ही सभी के साथ, विचरना न परिन्दों 

भेड़ों के “रूप” में छिपे हैं भेड़िये यहाँ 
फूलों को देख करके मचलना न परिन्दों

4 टिप्‍पणियां:

  1. भेड़ों के “रूप” में छिपे हैं भेड़िये यहाँ
    फूलों को देख करके मचलना न परिन्दों
    ..........................
    पग-पग पर फरेब है दुनिया में
    चलना जरा संभलकर
    की सीख देती बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. वर्तमान जगत में व्यक्ति आचरण का सुंदर चित्रण। आभार

    उत्तर देंहटाएं

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