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रविवार, 7 मई 2017

दोहे "लोकतन्त्र बीमार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जब कर्तव्यों के बिना, मिलते हों अधिकार।
समझो तब उस देश में, लोकतन्त्र बीमार।।
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आम आदमी के लिए, नियम और कानून।
जनसेवक हैं देश में, अब तो अफलातून।।  
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मन्त्री-सन्त्री-विधायक, मद में हैं मगरूर।
निर्धन-श्रमिक-किसान है, आज मजे से दूर।।
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सैलानी आते नहीं, सूनी है डलझील। 
गरमी में शीतल हवा, रही कलेजा छील।।
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केशर की क्यारी हुई, देखो आज तबाह।
जर्रे-जर्रे से वहाँ, निकल रही है आह।।
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सत्ता-शासन के लिए, जब हो जाता मेल।
उग्रवाद की नाक में, कैसे पड़े नकेल।।
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बद से बदतर हो रहे, सीमा पर हालात।
पहुँचाती आघात है, महबूबा की बात।।
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होते सीमा पार से, घात और प्रतिघात।
सैनिक शह को झेलकर, बचा रहे हैं मात।।
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अबलाओं की माँग का, उजड़ रहा सिन्दूर।
सीना छप्पन इंच का, हुआ आज मजबूर।।

2 टिप्‍पणियां:

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