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गुरुवार, 4 मई 2017

दोहे "सेना का अपमान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कभी न हारे जंग में, अपने सैनिक वीर।
शासन का रुख देखकर, सेना हुई अधीर।।
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घर से रहकर दूर जो, सहते तन पर वार।
बलिदानों के ही लिए, रहते हैं तैयार।।
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सेना करती है सदा, सीमा पर हुंकार।
सैनिक अपने वीर हैं, कायर है सरकार।।
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बैरी काट शहीद का, ले जाता है शीश।
मौन रह गये देखकर, दिल्ली के वागीश।।
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हर-हर की झंकार में, शंकर है गुमनाम।
सीना छप्पन इंच का, कब आयेगा काम।।
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जनता सीधे पूछती, सुलगे हुए सवाल।
महाकाल के वंशजों, कुछ तो करो कमाल।।
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महज दिखावे के लिए, क्या अपने हथियार।
मन में कैसा खौफ है, क्यों इतने लाचार।।
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रणभेरी का समय कब, आयेगा सुलतान।
और सहोगे कब तलक, सेना का अपमान।।
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लीपापोती के लिए, बुला रहे क्यों दूत।
युद्धभूमि में दीजिए, अपने सभी सुबूत।।
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बार-बार मत कीजिए, बैरी को अब माफ।
अब झूठे-नापाक को, जड़ से कर दो साफ।।

1 टिप्पणी:

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