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बुधवार, 10 मई 2017

गीत "अन्तरजाल हुआ है तन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कम्प्यूटर बन गई जिन्दगीअन्तरजाल हुआ है तन।
जालजगत के बिना कहीं भीलगता नहीं हमारा मन।।

जंगल लगता बहुत सुहानापर्वत अच्छे लगते हैं,
प्यारी-प्यारी बातें करतेबच्चे सच्चे लगते हैं,
सुन्दर-सुन्दर सुमनों वालालगता प्यारा ये उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भीलगता नहीं हमारा मन।।

सुख की बातें-दुख की बातेंबेबाकी से देते हैं,
भावों के सम्प्रेषण से हमअपना मन भर लेते हैं.
आभासी दुनिया में मिलताहमको कितना चैन-अमन।
जालजगत के बिना कहीं भीलगता नहीं हमारा मन।।

ग़ाफ़िलरविकरउड़नतश्तरीसुरभित सुमन खिलाते हैं,
उल्लू और मयंक निशा मेंविचरण करने आते हैं,
पंकहीन से कमल सुशोभितकरते बगिया और चमन।
जालजगत के बिना कहीं भीलगता नहीं हमारा मन।।

ताऊ कभी-कभी दिख जातासुस्ती सारी दूर हुई,
मगर फेसबुक के आगेब्लॉगिंग बिल्कुल मज़बूर हुई,
अदा-सदावन्दना-कनेरीमहकाती जातीं उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भीलगता नहीं हमारा मन।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।
    आभासी दुनिया में मिलता, हमको कितना चैन-अमन।
    आभासी दुनिया में भी एक अलग तरह का सुकून छुपा है ........

    सच है जिंदगी के हिस्सा बन गया जाल जगत

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-05-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2630 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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