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बुधवार, 17 मई 2017

दोहे "लोग हुए भयभीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गरमी पड़ती ग़ज़ब की, सूरज हुआ जवान।
मैदानी भूभाग पर, बढ़ा हुआ दिनमान।
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खरबूजा-तरबूज के, आसमान पर भाव।
चटनी-रोटी खाइए, मेरा यही सुझाव।।
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भीषण लू की मार से, लोग हुए भयभीत।
आम आदमी के लिए, मौसम है विपरीत।।
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जल का पड़ा अकाल सा, धरा रही है सूख।
पड़ी दरारें खेत में, सूख रहे हैं रूख।।
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तोरी-लौकी के जहाँ, बढ़े हुए हों दाम।
मध्यम वर्ग खरीदता, तरकारी दिल थाम।।
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लीची मन को मोहती, बौराये हैं आम।
इनको खाने के लिए, नहीं जेब में दाम।।
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वो अब राजा बन गये, कल तक थे जो रंक।
जनसेवक के आज फिर, बाहर निकले डंक।

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