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मंगलवार, 9 मई 2017

दोहे "कुदरत की करतूत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


धुँधला सा नभ हो गया, बरसा नभ से नीर।
बदला मौसम तो हुआ, मनवा बहुत अधीर।।
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अब गरमी कम हो गयी, ए.सी.-कूलर बन्द।
कुदरत की शीतल हवा, देती है आनन्द।।
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लीची बौरायी हुई, ललचाते हैं आम।
खरवूजा-तरबूज की, शोभा है अभिराम।।
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अभी पहाड़ों पर खिले, सुन्दर-सुन्दर फूल।
काफल और बुराँस का, शरबत है अनुकूल।।
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लिए अजूबे साथ में, कुदरत की करतूत।
आलू धरती में पलें, डाली पर शहतूत।।

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