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शनिवार, 11 नवंबर 2017

दोहे "आपस के सम्बन्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भाषा-भूषा-प्रान्त का, सभी जगह गुणगान।
जात-धर्म के जाल में, जकड़ा हिन्दुस्तान।।
--
लुप्त हो गये आज तो, आपस के सम्बन्ध।
सम्बन्धों के नाम पर, होते हैं अनुबन्ध।।
--
मर्यादा को ही सदा, मिलता है वनवास।
माला कैसे अब बने, मनके हुए उदास।।
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लोकतन्त्र के नाम पर, पाया जंगलराज।
आजादी तो मिल गयी, आया नहीं सुराज।।
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 उपवन में बढ़ने लगी, अब तो विष की बेल।
केवल मतलब के लिए, आपस में है मेल।।
--
बलशाली की यातना, लोग रहे हैं झेल।
जगह-जगह पर हो रहा, धन का खुल्ला खेल।।
--
भूल गये अपना सभी, गौरव और गुमान।
मात-पिता, आचार्य का, पग-पग पर अपमान।। 

1 टिप्पणी:

  1. लुप्त हो गये आज तो, आपस के सम्बन्ध।
    सम्बन्धों के नाम पर, होते हैं अनुबन्ध।।
    ...
    सटीक चिंतनशील प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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