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सोमवार, 20 नवंबर 2017

दोहे "नहीं रहा लालित्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन के दो चक्र हैं, सुख-दुख जिनके नाम।
दोनों ही हालात में, धीरज से लो काम।।

सरल सुभाव अगर नहीं, धर्म-कर्म सब व्यर्थ।
वक्र स्वभाव मनुष्य का, करता सदा अनर्थ।।

जीवन प्रहसन के सभी, इस दुनिया में पात्र।
सबका जीवन है यहाँ, चार दिनों का मात्र।।

छन्द-शास्त्र गायब हुए, मुक्त हुआ साहित्य।
गीत और संगीत में, नहीं रहा लालित्य।।

रत्तीभर चक्खा नहीं, लिया नहीं आनन्द।
छत्ते में डाका पड़ा, लुटा सभी मकरन्द।।

जिनकों फूलों ने दिये, घाव हजारों बार।
काँटों पर उनको भला, कैसे हो इतबार।।

हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।
उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।


3 टिप्‍पणियां:

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