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गुरुवार, 30 नवंबर 2017

दोहे "करना मत दुष्कर्म" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आदिकाल से चल रही, यही जगत में रीत।
वर्तमान ही बाद में, होता सदा अतीत।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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जीवित माता-पिता को, मत देना सन्ताप।
नित्य नियम से कीजिए, इनका वन्दन-जाप।।
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बुरा कभी मत सोचिए, करना मत दुष्कर्म।
सेवा और सहायता, जीवन के हैं मर्म।।

2 टिप्‍पणियां:

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