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शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

दोहे "नागफनी के फूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जगह-जगह पर हैं लगीं, लोगों की चौपाल।
शासन का रुख देखकर, होता बहुत मलाल।।

सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।

फूलों के बदले मिले, जनता को तो शूल।
नये ढंग से कर रही, कर सरकार वसूल।।

आजादी के आज तो, बदल गये हैं अर्थ।
उनको है स्वाधीनता, जो हैं आज समर्थ।।

कैसे रक्खें सन्तुलन, थमता नहीं उबाल।
खाली मन शैतान का, करता बहुत बबाल।।

भूखी जनता खा रही, भाषण लच्छेदार।
अब बहरी सरकार में, जनमानस लाचार।।

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