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बुधवार, 29 नवंबर 2017

दोहे "चरैवेति की सीख" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दुनियादारी में सदा, रखना संग विवेक।
उसको करते याद सब, जो होता है नेक।।

फैले हैं संसार में, यूँ तो पन्थ अनेक।
सबके दिल में जो बसे, वो नारायण एक।।

रूप-रंग सबका अलग, होता भिन्न विवेक।
उर मन्दिर में ही करो, ईश्वर का अभिषेक।।

कविता-कानन में उगे, अब तो छन्द अनेक।
अलग सभी की मापनी, अलग सभी की टेक।।

एक मुखी रुद्राक्ष तो, मिलना है आसान।
लेकिन दुर्लभ जगत में, एक मुखी इंसान।।

सात सुरों से ही बने, दुनिया में संगीत।
लेकिन आवागमन की, एक सभी की रीत।।

सरिताएँ देतीं हमें, चरैवेति की सीख।
सागर भी जल के लिए, उनसे माँगे भीख।।

सहज-सरल पगडण्डियाँ, खोज रहा हर एक।
पन्थ भले ही हों अलग, लेकिन मंजिल एक।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. इंसान की अंत में मंजिल भले एक हो लेकिन वह अंत तक यह बात कहाँ समझ पाता है
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 30-11-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2803 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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