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शनिवार, 4 नवंबर 2017

दोहे "हारा सरल सुभाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गरजे तो, बरसे नहीं, किया दिखावा मात्र।
उल्लू सीधा कर रहे, बे-पेंदे के पात्र।।

सुनकर मीठी बात को, बनना नहीं उलूक।
यथायोग ही कीजिए, शठ के साथ सुलूक।।

रूप-रंग औ ज्ञान के, जो हो मद में चूर।
साधारण को चाहिए, उनसे रहना दूर।।

बेर-केर का जगत में, होता नहीं निभाव।
जीत गयी टेढ़ी नजर, हारा सरल सुभाव।।

मतलब क्या उस मेल का, जब मन में हो मैल।
लीक छोड़ चलना नहीं, ओ कोल्हू के बैल।।

बैरी की करना नहीं, बार-बार मनुहार।
घर जाकर मक्कार के, मत बाँटो उपहार।।

थूक-थूककर चाटते, उनका क्या आधार।
जंगल में जनतन्त्र के, रँगे हुए हैं स्यार।।

2 टिप्‍पणियां:

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