श्रमिकों से जिनका नहीं, कोई भी सम्बन्ध।
श्रमिक-दिवस पर लिख रहे, वो भी शोध-प्रबन्ध।।
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सुबह दस बजे जागते, सोते आधी रात।
खाते माल हराम का, करते श्रम की बात।।
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काँटे और गुलाब का, कैसा है संयोग।
अन्तर आलू-आम का, नहीं जानते लोग।।
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नहीं गये जो बाग में, देखा नहीं बसन्त।
वही बने हैं आज भी, मजदूरों के सन्त।।
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जिसने झेली ही नहीं, शीत-ग्रीष्म-बरसात।
वो जननायक कर रहा, मजदूरों की बात।।
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सस्ता बिका किसान का, गेहूँ-चावल-दाल।
जाते ही बाजार में, आ जाता भूचाल।।
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महँगी बहुत शराब क्यों, कोई नहीं जवाब।
क्यों होती श्रमवीर की, हालत यहाँ खराब।।
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सत्ता में आये भले, कोई भी सरकार।
कोई श्रमिक-किसान का, नहीं करे उपकार।।
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मंगलवार, 30 अप्रैल 2019
दोहे "श्रम की बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 29 अप्रैल 2019
दोहे "चली झूठ की नाव" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
चलें चुनावी समर में, छल-बल के हथियार।।
राजनीति के सिन्धु में, चली झूठ की नाव।
भाषण की पतवार से, लड़ते लोग चुनाव।।
भीख माँगने आ गये, सारे भाषणवीर।
प्रजातन्त्र के खेल में, बिकने लगा जमीर।।
दर्पण से छल कर रही, अब खुद की तसवीर।
कृष्ण आजकल लाज का, खींच रहे हैं चीर।।
दानवता का कर रहा, मानव आविष्कार।
प्रजातन्त्र में हो गये, पैदा अब मक्कार।।
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रविवार, 28 अप्रैल 2019
समीक्षा “लौट चलें अब गाँव” (समीक्षक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
शनिवार, 27 अप्रैल 2019
दोहे "केवल कुनबावाद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
देर तलक मझधार में, तब से रहती नाव।।
संसद जाने के लिए, उमड़ रही है भीड़।
पलकों में सबकी सजा, लोकतन्त्र का नीड़।।
जाति-धर्म के नाम पर, दंगे और फसाद।
राजनीति में बढ़ रहा, केवल कुनबावाद।।
अगर किसी की खुल गई, एक बार तकदीर।
जीवन भर वो चाहता, बनना यहाँ वजीर।।
जनता से जिनका नहीं, रहा कभी सम्बन्ध।
उन्हें सियासत की यहाँ, आती खूब सुगन्ध।।
बेटे-पोतों के लिए, सब करते अनुबन्ध
आती है जनतन्त्र में, राजतन्त्र की गन्ध।।
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019
समीक्षा “प्रकाश स्तम्भ” (समीक्षक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गुरुवार, 25 अप्रैल 2019
गीत "पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अमलतास के पीले गजरे, झूमर से लहराते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते
हैं।।
ये मौसम की मार, हमेशा खुश हो कर
सहते हैं,
दोपहरी में क्लान्त पथिक को, छाया देते रहते
हैं,
सूरज की भट्टी में तपकर, कंचन से हो जाते
हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते
हैं।।
उछल-कूद करते मस्ती में, गिरगिट और
गिलहरी भी,
वासन्ती आभास कराती, गरमी की दोपहरी
भी,
प्यारे-प्यारे सुमन प्यार से, आपस में बतियाते
हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते
हैं।।
लुभा रहे सबके मन को, जो आभूषण तुमने
पहने,
अमलतास तुम धन्य, तुम्हें कुदरत
ने बख्शे हैं गहने,
सड़क किनारे खड़े तपस्वी, अभिनव “रूप”
दिखाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते
हैं।।
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बुधवार, 24 अप्रैल 2019
ग़ज़ल "दिल की लगी क्या चीज़ है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दिलज़लो से पूछिए, दिल की लगी क्या चीज़ है
लटकाए फिरता है गले में, वो यार का ताबीज़ है
हमराह तो हमराह से, ताउम्र करता है वफा
इश्क में पागल दरिन्दा, लाँघता दहलीज़ है
राज़ दिल के खोलने को, हमसफर तो चाहिए
ज़िन्दग़ी में एक ऐसे, दोस्त की तजबीज़ है
चाहता करना भलाई, किन्तु करता तो नहीं
है बहुत कुछ आदमी, लेकिन बना *आजीज़ है
दिल सदा रहता जवां, प्यार बसता है जहाँ
हुस्न से मत कर मुहब्बत, 'रूप' तो नाचीज़ है
*आजीज=पराया
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