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बुधवार, 17 अप्रैल 2019

विविध दोहे "धड़कन बिना शरीर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बचा न कोई काल से, राजा-रंक फकीर।
मिट्टी का है लोथड़ा, धड़कन बिना शरीर।।

सच्चे जियें अभाव में, झूठे बनें वजीर।
दर-दर भटकें देश में, ज्ञानी सन्त कबीर।।

कोई धन का दास है, कोई यहाँ फकीर।
दुर्जन को नवनीत है, सज्जन को है नीर।।

होता अपने देश में, हर सैनिक प्रणवीर।
जिसमें रणकौशल छिपा, वो ही है रणधीर।।

सबकी किस्मत में नहीं, होता सुखद समीर।
होती हर सन्तान की, अलग-अलग तकदीर।।

हुए एक ही कोख से, दो बालक उत्पन्न।
कोई यहाँ विपन्न है, कोई है सम्पन्न।।

चमचों को हैं पालते, राजा और वजीर।
बँधे हुए हैं द्वार पर, चमचे बिन जंजीर।।

पड़ी हुई हैं पाँव में, मजहब की जंजीर।
पण्डित-मुल्ला-पादरी, करते हैं तकरीर।।

2 टिप्‍पणियां:

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