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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

समीक्षा “प्रकाश स्तम्भ” (समीक्षक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


“प्रकाश स्तम्भ”
रुपहली सुबह में आशा की किरण
     सोशल साइट पर मेरे बहुत सारे मित्र हैं। इसलिए सभी को याद रखना बहुत कठिन होता है। पिछले सप्ताह किसी मित्र की पुस्तक के विमोचन में मैं दिल्ली गया था। वहाँ मेरी भेंट सुस्थापित कवयित्री श्रीमती सूक्ष्मलता महाजन से   हुई। वहाँ आपने मुझे अपनी अतुकान्त रचनाओं की कृति “प्रकाश स्तम्भ” भेंट की। जिसको में अपने पुस्तकालय में सहेजने जा ही रहा था। लेकिन जब इस कृति को पढ़ा तो विचार आया कि क्यों न पहले “प्रकाश स्तम्भ” के बारे में ही कुछ शब्द लिखूँ और कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर मेरी अँगुलियाँ चलने लगीं।
     अमृत प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित “प्रकाश स्तम्भ” 96 पृष्ठ की अतुकान्त रचनाओं की सजिल्द पुस्तक है। जिसका मूल्य दो सौ रुपये मात्र है।
     विदूषी कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन ने अपने काव्य संकलन में 54 विविधवर्णी रचनाओं को स्थान दिया है। मेरा मानना है कि तुकान्त रचनाओं में रचनाकार प्रयास करके तुकबन्दी करता है जिसके कारण कई बार मन के भाव और भा, में भिन्नता आ जाती है लेकिन अतुकान्त रचनाओं में भाव और भाषा में सदैव सामंजस्य रहता है। अतुकान्त लेखन में एक विशेष बात यह होती है कि इसमें प्रभावशाली शब्द ही रचना को जीवन्त और कालजयी बनाते हैं।
      कवयित्री ने अपने संकलन “प्रकाश स्तम्भ” में आम जीवन से जुड़ी मार्गदर्शक, मेला, अबला, डरी हुई लड़की, दहेज, मदहोश जवानी, जमीर, कालचक्र, याद, बीती बतिया, परिणय, टिक-टिक, प्रकटी, जीवन, विशाल, साधु, होली, अमूल्य निधि, अद्वैत, वात्सल्य, कमल पुष्प, मुस्कराता बसन्त, दीपक, जीने की कला, नई दुनिया, मेरा देश, स्तापना, नयासाल, ग्रहण, वायरस, उड़ान, अपने पराये, परमपिता, कर्मतीत, प्रकृति, माला, वर्षगाँठ, मुसाफिर, कोलाहल, साथी, आस, बचपन, प्रकाश स्तम्भ, वीर शिवाजी, जन्मदिन, सुबह, राजनीति, असमंजस, खिवैया, आधुनिकता, आदि शीर्षकों से उपयोगी रचनाओं पर अपनी कलम चलाई है।
      प्रत्येक रचना शब्द माँ शारदे का स्तवन होता है। अतः कवयित्री ने सरस्वती वन्दना के मिथक को झुठलाते हुए “मार्गदर्शक” शीर्षक से संकलन का शुभारम्भ करते हुए लिखा है-
“अन्धकार के अथाह सागर में
आनन्द किरणें फैला रहा
अपने-पराये का भेद किये बिन
मार्ग सबको दिखा रहा

आशा की किरणें फैला कर
मार्ग करता सबका जगमग
दिन रात वो खड़ा अडिग
राह तकता आगन्तुक की”
      नारी शक्ति का आह्वान करते हुए “अबला” से कवयित्री ने अपनी अभिव्यक्ति में लिखा है-
“क्यूँ पुकारे तुझे कह अबला
तू तो है सृष्टि का आधार
सिखलाती सबको व्यवहार
करती जीवन का उद्धार”
      कवयित्री ने “जमीर” शीर्षक से अपनी बात कुछ इस प्रकार से कही है-
“बनते जाओ तुम फकीर
चमका लो अपनी तकदीर
यही है बाबा की तदबीर
जगा कर रखो अपना जमीर”
      “मेरा देश” के बारे में कवयित्री ने देश भक्ति के बारे में अनेकता में एकता का सन्देश देते हुए लिखा है-
“देश मेरा यह प्यारा देश
इसमें समाये बहुत से प्रदेश
भिन्न-भिन्न सबके परिवेश
फिर भी दिखते सभी हैं एक”
      “मेरा बाबा परमपिता” के बारे में अपने उद्गार प्रकट करते हुए कवयित्री ने लिखा है-
“कौन कहता है वो नहीं है
वह तो हर पल हर घड़ी यहीं है
अपनों के साथ अपनों के बीच
हर पौध को रहा है सींच”
      “जीने की कला” में अपने विचार देते हुए कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन कहती हैं-
“जीना एक कला है
करना सबका भला है
दुश्मन हो या हो दोस्त
देने में न करना कोफ्त”
     “कर्मातीत” को परिभाषित करते हुए कवयित्र लिखती हैं-
“अपने प्रेम में जकड़े रखना
माया के जाल में न फँसने देना
उल्टे होकर लटकने न देना
बढ़ते रहें हम तुम थामे रखना”
     “मुस्कराता बसन्त” कैसा होना चाहिए, देखिए-
“सरदी का कोहरा हटा
फैली सर्वत्र स्वर्णिम छटा
लुप्त हो गयी आलस्य की घटा
मुस्कराता बसन्त है द्वार पर खड़ा”
       वर्तमान परिवेश में “डरी हुई लड़की” के बारे में कवयित्री ने अपने शब्द कुछ इस प्रकार उकेरे हैं-
“कितनी डरी हुई है लड़की
गुहार लगाती मिन्नतें करती
उनसे वो मनुहार है करती
जो शायद हैं खुद डरे हुए
दुःख विषाद से भरे हुए”
      साहित्य की विभिन्न विधाएँ साहित्यकार की देन होती हैं। जो समाज को दिशा प्रदान करती हैं, जीने का मकसद बताती हैं। सूर, कबीर, तुलसी, जायसी, नरोत्तमदास इत्यादि समस्त कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ नया देने का प्रयास किया है। “प्रकाश स्तम्भ” भी इसी तरह का प्रयोग है। जो कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन की कलम से निकला है।
     मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास भी है कि आपकी कविताएँ पाठकों के दिल की गहराइयों तक जाकर अपनी जगह बनायेगी और समीक्षकों की दृष्टि में भी यह उपादेय सिद्ध होगी। साथ ही मुझे आसा है कि निकट भविष्य में आपकी अन्य कृतियाँ भी पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी।
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-  
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
समीक्षक एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
सम्पर्क-7906360576, 7906295141
ई-मेल- roopchandrashastri@gmail.com
वेब साइट- http://uchcharan.blogspot.com/

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर समीक्षा की है आदरनीयआपने। मैं कृतज्ञ हूँ कि मुझ अकिंचन को आप जैसे सिद्धसत साहित्यकार का आशीररवाद मिल सका। भविष्य
    में भी मुझे आपका मार्ग दर्शन मिलता रहेगाऐसा मेरा विश्वास है। ह्रदय से आपका आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (27-04-2019) "परिवार का महत्व" (चर्चा अंक-3318) को पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    --अनीता सैनी

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीया महाजन मैम आप को इस सारगर्भित कृति के लिए बधाई और शुभकामनाएं आप के लेखन की निरंतरता और निर्मलता सदा बनीं रहे यही भाव आपके व्यक्तित्व को परिलक्षित और परिभाषित करते हैं ।
    आप का ईश्वर के प्रति विश्वास आपको सरलता प्रदान करता है ।
    सादर, सस्नेह।
    सोनम यादव गाजियाबाद महानगर

    उत्तर देंहटाएं

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