"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 14 अप्रैल 2019

"मित्र अलबेला खत्री की 5वीं पुण्य तिथि पर"

आज मेरे मित्र
अलबेला खत्री जी की
5वीं पुण्यतिथि है।
उनको शत्-शत् नमन करते हुए-
सूखे हुए छुहारे, किसको लुभायेंगे अब?
अपने नये तराने, किसको सुनायेंगे अब?

हास्य की झलक से,
सूनी हुई धरा है।
मुस्कान के क्षितिज का,
सूरज यहाँ मरा है।
मनुहार-प्यार से हम, किसको बुलायेंगे अब?
अपने नये तराने, किसको सुनायेंगे अब?

तुम स्वर्ग की धरा पर,
आबाद नीड़ करना।
भगवान की शरण में,
होगा कभी न मरना।
हम भी इसी डगर पर, जल्दी ही आयेंगे अब।
अपने नये तराने, किसको सुनायेंगे अब?

व्यंग्य के धनी को,
श्रद्धा सुमन समर्पित।
आँसू की मंजुमाला,
मैं कर रहा हूँ अर्पित।
गुजरे हुए मुसाफिर, वापिस न पायेंगे अब।
अपने नये तराने, किसको सुनायेंगे अब?
5 साल पहले

प्रियवर अलबेला खत्री  जी को समर्पित करते हुए

यह रचना लिखी थी।
chhuhara
अंगूर के सभी गुण,
किशमिश में आ गये हैं!
सूखे हुए छुहारे,
उनको लुभा गये हैं!!

बूढ़े हुए तो क्या है,
मन में भरा है यौवन,
गीतों के जाम में ही,
ढाला हुआ है जीवन,
इस उम्र में भी हम तो,
दुनिया को भा गये हैं!
सूखे हुए छुहारे,
उनको लुभा गये हैं!!

हम तो नवल-नवेले,
थाली के हम हैं बेले,
काँसे की हम खनक में,
नाचे हैं और खेले,
उनकी नजर में हम तो,
ब्लॉगिंग में छा गये हैं!
सूखे हुए छुहारे,
उनको लुभा गये हैं!!

ठेले हैं शब्द हमने,
कुछ जोड़-तोड़ करके,
व्यञ्जन परोसते हैं,
हम तोड़-मोड़ करके,
उनके ही शीर्षक से,
यह राग पा गये हैं!
सूखे हुए छुहारे,
उनको लुभा गये हैं!!
इस रचना पर अलबेला जी ने 
यह कमेंट किया था।
वाह प्रभु वाह !
मैंने चैतन्य महा प्रभु को नहीं देखा लेकिन आप जैसे महाप्रभु की चैतन्यता ने निहाल कर दिया..आपका शिष्यत्व स्वीकार करलूं और वहीँ उत्तराखंड में ही कहीं रहने लगूं.....ऐसे विचार मानस में धींगा-मुश्ती करने लगे हैं ..कहिये क्या करूं ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति राष्ट्रीय अग्निशमन सेवा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या बात है आदरणीय गुरु जी | किसी मित्र को समर्पित इससे सुंदर भाव नहीं हो सकते | अलबेला जी को शत शत नमन | रचनाएँ बहुत ही भावपूर्ण हैं सादर --

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails