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गाँवों की गलियाँ, चौबारे, याद बहुत आते हैं।
कच्चे-घर और ठाकुरद्वारे, याद बहुत आते हैं।।
छोड़ा गाँव, शहर में आया, आलीशान भवन बनवाया,
मिली नही शीतल सी छाया, नाहक ही
सुख-चैन गँवाया।
बूढ़ा बरगद, काका-अंगद, याद बहुत
आते हैं।।
अपनापन बन गया बनावट, रिश्तेदारी
टूट रहीं हैं।
प्रेम-प्रीत बन गयी दिखावट, नातेदारी
छूट रहीं हैं।
गौरी गइया, मिट्ठू भइया, याद बहुत
आते हैं।।
भोर हुई, चिड़ियाँ भी बोलीं, किन्तु शहर
अब भी अलसाया।
शीतल जल के बदले कर में, गर्म चाय का
प्याला आया।
खेत-अखाड़े, हरे सिंघाड़े, याद बहुत आते
हैं।।
चूल्हा-चक्की, रोटी-मक्की, कब का नाता
तोड़ चुके हैं।
मटकी में का ठण्डा पानी, सब ही पीना
छोड़ चुके हैं।
नदिया-नाले, संगी-ग्वाले, याद बहुत
आते हैं।।
घूँघट में से नयी बहू का, पुलकित हो
शरमाना।
सास-ससुर को खाना खाने, को आवाज
लगाना।
हँसी-ठिठोली, फागुन-होली, याद बहुत
आते हैं।।
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गांव भी अब पहले जैसे कहां रहे ! शहराती हवा ने सब उलट-पलट कर रख दिया है
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन याद बहुत आते हैं।
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