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गुरुवार, 21 मई 2009

"टोपी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गंजापन ढकने को टोपी, मेरे सिर पर रहती है।
ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , बार-बार यह कहती है।।



देखो अपनी गाँधी टोपी,
सारे जग से न्यारी है।
आन-बान भारत की है ये,
हमको लगती प्यारी है।।






लालबहादुर और जवाहर जी ने,
इसको धार लिया।
भारत का सिंहासन इनको,
टोपी ने उपहार दिया।।






टोपी पहिन सुभाषचन्द्र,
लाखों में पहचाना जाता।
टोपी वाले नेता का कद,
ऊँचा है माना जाता।।






खादी की टोपी, धोती,
कुर्ते, की शान निराली है।
बिना पढ़े ही ये पण्डित,
का मान दिलाने वाली है।।


टोपी पहन सलामी,
अपने झण्डे को हम देते हैं।
राष्ट्र हेतु मर-मिटने का प्रण,
हम खुश होकर लेते है।।
(चित्र गूगल से साभार)

5 टिप्‍पणियां:

  1. शायद तभी आज के नेता टोपी पहनने में हिचकिचाते हैं.
    आपका ब्लॉग खुलने में 'इन्टरनेट एक्स्प्लोरर' में कुछ दिक्कत आ रही है.

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी टोपी महिमा की कविता भी बडी शानदार है. धन्यवाद.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. यह भी बालगीत ही है!

    और

    हर बार की तरह यह भी अच्छा है!

    जवाब देंहटाएं
  4. टोपी की हर बात निराली,
    टोपी है सौगात निराली!
    जिसके सिर पर सज जाती यह,
    करता वह हर मात निराली!

    जवाब देंहटाएं

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