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गुरुवार, 14 मई 2009

"क्यों नाहक मन भरमाते हो?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दर्पण साथ नही देगा, क्यों नाहक मन भरमाते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


मौसम के काले कुहरे को, जीवन में मत छाने दो,

सुख-सपनों में कभी नही, इसको कुहराम मचाने दो,

धरती पर बसने वालो, क्यों आसमान तक जाते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


नाम मुहब्बत है जिसका, वो जीवन भर तड़पाती हैं,

खुश-नसीब को हर्षाती यह, बाकी को भरमाती है,

सुमन चुनों उपवन में से, क्यों काँटे चुन कर लातें हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


मन को वश मे कर लो, देता सन्देशा है भव-सागर,

सलिल सुधा से भर जायेगी, प्रेम-प्रीत की ये गागर,

मंजिल पर जाना है तो, क्यों राहों से घबराते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


खट्टी-मीठी यादों से ,खाली मन को मत भरमाना,

मुरझाये उपवन को फिर से, हरा-भरा करते जाना,

अपनेपन की बात करो, क्यों बे-मतलब लहराते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?

12 टिप्‍पणियां:

  1. अपनेपन की बात करो, क्यों बे-मतलब लहराते हो?हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?

    वाह वाह शाश्त्री जी, क्या जोरदार रचना है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. अपनी बात को बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त किया है !
    शुक्रिया !

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह जी आपने तो मुझे अपना कायल कर लिया है

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही बढ़िया शास्त्री जी, बेहतरीन रचना।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत खूब। इश्को-आशिकी के क्षेत्र में भी डण्डे की महिमा का यूं बखान...क्या बात है शास्त्रीजी

    जवाब देंहटाएं
  6. behtrin..........bahut hi badhiya rachna likhi hai.badhayi.

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह शास्त्री जी............आपकी रचना बहुत लय में और गीत की तरह गाये जाने वाले होते हैं............विषय को बहुत ही खूबसूरती से उठाते हैं आप अपनी हर रचना में...........लाजवाब

    जवाब देंहटाएं
  8. आपका यह भावपूर्ण सुन्दर गीत मन मोह गया..प्रस्तुति हेतु आभार.

    जवाब देंहटाएं
  9. ये गीत कहाँ से लाते हो?
    जो झट मन में बस जाते हैं,

    यूँ ही तुम रचते रहो मीत,
    हम मन ही मन में गाते हैं!

    जवाब देंहटाएं
  10. प्रियवर रावेंद्रकुमार रवि जी!

    मैं करता नही प्रयास कभी,
    ये बरबस ही आ जाते हैं।
    मन के कुछ अन्तर्भाव,
    छन्द का रूप लिए छा जाते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  11. हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?

    आपने तो ऐसे कहा है जैसे कोई गुनाह हो!

    जवाब देंहटाएं

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