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शनिवार, 2 मई 2009

"मानवता से लड़ने वालो, दया-धर्म अपनालो।"


आसमान में उड़ने वालो, नजर धरा पर भी डालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।


काँटों की चौकीदारी ही, सुमन खिलाती है,

दुनियादारी में निष्ठा ही, मीत मिलाती है,

कुण्ठाओं में कुढ़ने वालो, गीत प्रेम के गा लो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।



दुख-सुख में सच्चे मन से, शामिल होना भी सीखो,

अपने अन्तस् की गलियों की, जिद्दी पंक उलीचो,

बिना बात ही अड़ने वालो, दीप स्नेह के बालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।



प्रीत मथानी लेकर ढूँढो, अमृत के कण-कण को,

झंझावातों के सागर में, मत उलझाओ सुमन को,

मानवता से लड़ने वालो, दया-धर्म अपनालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेरक एवं मार्ग दर्शक रचना है। आभार।

    -----------
    TSALIIM
    SBAI

    जवाब देंहटाएं
  2. आसमान में उड़ने वालो, नजर धरा पर भी डालो।
    sir
    Very Nice poem.......................thanx 2u.
    MUMBAI TIGER
    HEY PRABHU YEH TERAPANTH

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रेरणा देती है यह रचना ..शुक्रिया इसको पढ़वाने का

    जवाब देंहटाएं
  4. सच मे दया धर्म अपनाने की ज़रूरत है॥

    जवाब देंहटाएं
  5. प्रेरणादायक बेहतरीन रचना.

    जवाब देंहटाएं
  6. आसमान में उड़ने वालो, नजर धरा पर भी डालो।
    क्या खूब कह दिया आपने....प्रेरणा देने वाले रचना..बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  7. कांटो की पहरेदारी ही..फूल खिलाती है....बहुत गहरी बात कही है आपने. अति सुन्दर भाव!!

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत प्रभावशाली व्यंग्य-बाणों का
    प्रक्षेपण किया है आपने!
    विकसित समझवाले ही इससे
    सही दिशा में प्रेरित हो पाएँगे!

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत ही उत्प्रेरक पोस्ट.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं

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