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शुक्रवार, 15 मई 2009

‘‘बस एक मुलाकात में, ही शेर गढ़ लिया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बस एक मुलाकात में, ही शेर गढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।


भावनाओं ने नयी भाषा निकाल ली,

कामनाओं ने भी दिलासा निकाल ली,

दुर्गम पहाड़ियों पे, तेरा यार चढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।


मैने गगन से एक आफताब पा लिया,

बदली से मैंने एक माहताब पा लिया,

रस्मो-रिवाज तोड़के, उस पार बढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  2. बस एक मुलाकात में ही
    प्यार कर लिया!
    हर पल साथ निभाने का
    करार कर लिया!

    जवाब देंहटाएं
  3. बढ़िया लगी आपकी भावाभियक्ति !!

    जवाब देंहटाएं
  4. kya baat hai aapki to........ek mulaqat mein hi itna badhiya sher gadh liya........bahut badhiya.

    mulaqat khoob rang layi
    pyar ki bhasha padha gayi
    aankhon hi aankhon mein
    kya haal bana gayi

    जवाब देंहटाएं
  5. शास्त्री जी को प्रणाम, रचना की तारीफ़ में क्या कहूँ सभी कह रहे हैं

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह शास्त्री जी.........आपकी लाजवाब रचना है
    सीधे दिल में उतरती है ..........

    जवाब देंहटाएं

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