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बुधवार, 6 मई 2009

‘‘धूप का संसार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

धूप के संसार में

लोग

मोम जैसे बन गये हैं,

हर चेहरा,

सुबह को कुछ और है,

जाना पहचाना सा लगता है,

परन्तु

शाम तक,

पिघल जाता है

और

बदसूरत हो जाता है,

वह

अपना रूप,

आकृति

सब कुछ बदल लेता है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. और शहर जैसे जंगल हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. sach ye sansaar aur iski har aakriti aisi hi hai...........bahut hi thode shabdon mein bahut hi gahri baat kah di apne.
    badhayi sweekarein.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही बात कही है जी आपने.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रतीकों के सहारे गहरी बात कही आपने।

    -----------
    SBAI TSALIIM

    उत्तर देंहटाएं
  5. धूप के संसार में लोगमोम जैसे बन गये हैं
    बेहतरीन उपमाएं......

    उत्तर देंहटाएं
  6. धूप के इस संसार में
    मोम बन चुके मनुष्य का
    भोर के समय जाना-पहचाना
    लगनेवाला चेहरा
    संध्या से पहले ही पिघलकर
    विकृत हो जाता है
    और वह
    अपना मनुष्यत्व खो देता है!

    मनुष्य को पुन: बनने के लिए मनुष्य
    चाहिए होती है
    एक पूरी स्याह रात!

    विचारणीय यह है कि
    अगर उसके जीवन में
    यह रात न आए,
    तो क्या होगा!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण !!!

    उत्तर देंहटाएं

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