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गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

"गीत-फिर से वीणा झंकार करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अब समय आ गया सुखनवरो!
अपने शब्दों में धार भरो।
सोई चेतना जगाने को,
जनमानस में हुंकार भरो।।

अनुबन्धों में भी मक्कारी,
सम्बन्ध बन गये व्यापारी।
जननायक करते गद्दारी,
लाचारी में दुनिया सारी।
अब नहीं समय शीतलता का,
मलयानिल में अंगार भरो।
सोई चेतना जगाने को,
जनमानस में हुंकार भरो।।

है उपासना वासनायुक्त,
करना इसको वासनामुक्त।
कायरता का है उदयकाल,
हो गयी वीरता आज लुप्त।
अब पैन बाण सा पैना कर,
गांडीव उठा टंकार करो।
सोई चेतना जगाने को,
जनमानस में हुंकार भरो।।

मत उत्तेजक शृंगार करो,
मिश्री जैसा मत प्यार करो।
छन्दों की सबल इमारत में,
मानवता का आधार धरो।
निज “रूप” पुरातन पहचानो,
फिर से वीणा झंकार करो।
सोई चेतना जगाने को,
जनमानस में हुंकार भरो।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब बहुत ही लाज़वाब अभिव्यक्ति आपकी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया रचना...
    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. निज “रूप” पुरातन पहचानो,
    फिर से वीणा झंकार करो।
    सोई चेतना जगाने को,
    जनमानस में हुंकार भरो...बहुत सुंदर गीत

    उत्तर देंहटाएं
  4. कुछ नया करने का सशक्त आवाहन करती है यह रचना :

    अनुबन्धों में भी मक्कारी,
    सम्बन्ध बन गये व्यापारी।
    जननायक करते गद्दारी,
    लाचारी में दुनिया सारी।
    अब नहीं समय शीतलता का,
    मलयानिल में अंगार भरो।
    सोई चेतना जगाने को,
    जनमानस में हुंकार भरो।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कल 12/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति ,....आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया सुंदर रचना व प्रस्तुति , आ. शास्त्री जी को धन्यवाद !
    नवीन प्रकाशन -: बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( ~ अनमोल रत्न है यहशरीर ~ ) - { Inspiring stories part - 5 }

    उत्तर देंहटाएं

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