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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

"मेरे तीन पुराने गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों आज प्रस्तुत कर रहा हूँ,
गाम्य जीवन से जुड़े अपने तीन गीत।
जो मेरे काव्य संग्रह सुख का सूरज में
प्रकाशित हो चुके हैं।

(१)
शुक्रवार, 13 मार्च 2009
"टूटा स्वप्न" 
मेरे गाँवगली-आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

घर के आगे पेड़ नीम कावैद्यराज सा खड़ा हुआ है।
माता जैसी गौमाता काखूँटा अब भी गड़ा हुआ है।
टेसू के फूलों से गुंथिततीनपात की हर डाली है
घर के पीछे हरियाली हैलगता मानो खुशहाली है।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

पीपल के नीचे देवालयजिसमें घण्टे सजे हुए हैं।
सांझ-सवेरे भजन-कीर्तन,ढोल-मंजीरे बजे हुए हैं।
कहीं अजान सुनाई देतीगुरू-वाणी का पाठ कहीं है।
प्रेम और सौहार्द परस्परवैर-भाव का नाम नही है।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

विद्यालय में सबसे पहलेईश्वर का आराधन होता।
देश-प्रेम का गायन होतातन और मन का शोधन होता।
भेद-भाव और छुआ-छूत का,सारा मैल हटाया जाता।
गणित और विज्ञान साथ मेंपर्यावरण पढ़ाया जाता।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

रोज शाम को दंगल-कुश्तीऔर कबड्डी खेली जाती।
योगासन के साथ-साथ हीदण्ड-बैठकें पेली जाती।
मैंने पूछा परमेश्वर सेजन्नत की दुनिया दिखला दो।
चैन और आराम जहाँ होमुझको वह सीढ़ी बतला दो।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

तभी गगन से दिया सुनाईतुम जन्नत में ही हो भाई।
मेरा वास इसी धरती परजिसकी तुमने गाथा गाई।
तभी खुल गयी मेरी आँखेंचारपाई दे रही गवाही।
सुखद-स्वप्न इतिहास बन गयाछोड़ गया धुंधली परछाई।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअब तो बस अञ्जानापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंबसा हुआ दीवानापन है।।

कितना बदल गया है भारतकितने बदल गये हैं बन्दे।
मानव बन बैठे हैं दानवतन के उजलेमन के गन्दे।
वीर भगत सिंह के आने कीअब तो आशा टूट गयी है।
गांधी अब अवतार धरेंगेअब अभिलाषा छूट गयी है।
सन्नाटा फैला आँगन मेंआसमान में सूनापन है।
चारों तरफ प्रदूषण फैलाव्यथित हो रहा मेरा मन है।।
मेरे गाँवगली आँगन मेंअपनापन ही अपनापन है।
देश-वेश-परिवेश सभी मेंकहीं नही बेगानापन है।।

(२)
सोमवार, 2 मार्च 2009
"याद बहुत आते हैं" 
गाँवों की गलियाँचौबारेयाद बहुत आते हैं।
कच्चे-घर और ठाकुरद्वारेयाद बहुत आते हैं।।

छोड़ा गाँवशहर में आयाआलीशान भवन बनवाया,
मिली नही शीतल सी छाया, नाहक ही सुख-चैन गँवाया।
बूढ़ा बरगदकाका-अंगद, याद बहुत आते हैं।।

अपनापन बन गया बनावट, रिश्तेदारी टूट रहीं हैं।
प्रेम-प्रीत बन गयी दिखावट, नातेदारी छूट रहीं हैं।
गौरी गइयामिट्ठू भइया, याद बहुत आते हैं।।

भोर हुईचिड़ियाँ भी बोलीं, किन्तु शहर अब भी अलसाया।
शीतल जल के बदले कर में, गर्म चाय का प्याला आया।
खेत-अखाड़ेहरे सिंघाड़े, याद बहुत आते हैं।।

चूल्हा-चक्कीरोटी-मक्की, कब का नाता तोड़ चुके हैं।
मटकी में का ठण्डा पानी, सब ही पीना छोड़ चुके हैं।
नदिया-नालेसंगी-ग्वाले, याद बहुत आते हैं।।

घूँघट में से नयी बहू का, पुलकित हो शरमाना।
सास-ससुर को खाना खाने, को आवाज लगाना।
हँसी-ठिठोलीफागुन-होली, याद बहुत आते हैं।।

(३)
शुक्रवार26 मार्च 2010
हमको याद दिलाते हैं” 
जब भी सुखद-सलोने सपने,  नयनों में छा आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।

सूरज उगने से पहलेहम लोग रोज उठ जाते थे,
दिनचर्या पूरी करके हमखेत जोतने जाते थे,
हरे चने और मूँगफली केहोले मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

मट्ठा-गुड़ नौ बजते हीदादी खेतों में लाती थी,
लाड़-प्यार के साथ हमेंवह प्रातराश करवाती थी,
मक्की की रोटीसरसों का साग याद आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

आँगन में था पेड़ नीम काशीतल छाया देता था,
हाँडी में का कढ़ा-दूध, ताकत तन में भर देता था,
खो-खो और कबड्डी-कुश्ती, अब तक मन भरमाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

तख्ती-बुधका और कलमबस्ते काँधे पे सजते थे,
मन्दिर में ढोलक-बाजाखड़ताल-मँजीरे बजते थे,
हरे सिंघाड़ों का अब तकहम स्वाद भूल नही पाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

युग बदलापहनावा बदलाबदल गये सब चाल-चलन,
बोली बदलीभाषा बदलीबदल गये अब घर आंगन,
दिन चढ़ने पर नींद खुलीजल्दी दफ्तर को जाते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन कीहमको याद दिलाते हैं।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. भाव -प्रबंध से सुन्दर गीत :


    मेरे गाँव, गली-आँगन में, अपनापन ही अपनापन है।
    देश-वेश-परिवेश सभी में, कहीं नही बेगानापन है।।
    "याद बहुत आते हैं"
    गाँवों की गलियाँ, चौबारे, याद बहुत आते हैं।
    कच्चे-घर और ठाकुरद्वारे, याद बहुत आते हैं।।
    शुक्रवार, 26 मार्च 2010
    “हमको याद दिलाते हैं”
    जब भी सुखद-सलोने सपने, नयनों में छा आते हैं।
    गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ए 20 वी शताब्दी के किसी गाँव का चित्रण लगता है।
    आज कल के गांगांवों में ऐसे दृश्य शायद कहीं मिल जाएं!
    वरना ए सपना सा लगता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ए 20 वी शताब्दी के किसी गाँव का चित्रण लगता है।
    आज कल के गांगांवों में ऐसे दृश्य शायद कहीं मिल जाएं!
    वरना ए सपना सा लगता है।

    उत्तर देंहटाएं

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