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गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

"ग़ज़ल-नदी के रेत पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



रोज लिखता हूँ इबारत, मैं नदी के रेत पर
शब्द बन जाते ग़ज़ल मेरे नदी के रेत पर

जब हवा के तेज झोकों से मचलती हैं लहर
मेट देती सब निशां मेरे, नदी के रेत पर

चाहिए कोरे सफे, सन्देश लिखने के लिए
प्रेरणा मिलती मुझे, आकर नदी के रेत पर

हो स्रजन नूतन, हटें मन से पुरानी याद सब
निज नवल-उदगार को, रचता नदी के रेत पर

रूप भाता हैं मुझे बिखरी हुई बलुआर का
इसलिए आता बराबर, मैं नदी के रेत पर

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.04.2014) को "चल रास्ते बदल लें " (चर्चा अंक-1593)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. चाहिए कोरे सफे, सन्देश लिखने के लिए
    प्रेरणा मिलती मुझे, आकर नदी के रेत पर
    वाह्ह्ह बहुत सुन्दर रचना हार्दिक बधाई आपको आ० शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं

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