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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

"उन्मीलन पत्रिका में मेरा एक गीत-अच्छा लगता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उन्मीलन पत्रिका में
मेरा एक गीत
शिष्ट मधुर व्यवहारबहुत अच्छा लगता है। 
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।

फूहड़पन के वस्त्रबुरे सबको लगते हैं,
जंग लगे से शस्त्रबुरे सबको लगते हैं,
स्वाभाविक शृंगारबहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।

वचनों से कंगालबुरे सबको लगते हैं,

जीवन के जंजालबुरे सबको लगते हैं,
सजा हुआ घर-बारबहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।


चुगलखोर इन्सानबुरे सबको लगते हैं,
सूदखोर शैतानबुरे सबको लगते हैं,
सज्जन का सत्कारबहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।


लुटे-पिटे दरबारबुरे सबको लगते हैं,
दुःखों के अम्बारबुरे सबको लगते हैं,
हरा-भरा परिवारबहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।


मतलब वाले यारबुरे सबको लगते हैं,
चुभने वाले खारबुरे सबको लगते हैं,
निश्छल सच्चा प्यारबहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसारबहुत अच्छा लगता है।।

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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया सीख है इस कविता में..
    .. सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01-05-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut sundar sandesh prasarit karti rachna .patrika me prakashit hone hetu badhai

    उत्तर देंहटाएं

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