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सोमवार, 14 अप्रैल 2014

"धरती पर नजारों को बुलाते हो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ग़मों की ओड़कर चादर, बहारों को बुलाते हो
बिना मौसम के धरती पर, नजारों को बुलाते हो

गगन पर सूर्य का कब्जा, नहीं छायी कहीं बदली
बड़े नादान हो दिन में, सितारों को बुलाते हो

नहीं चिट्ठी-नहीं पत्री, नहीं मौसम सुहाना है
बिना डोली सजाये ही, कहारों को बुलाते हो

कब्र में पैर लटके हैं, हुए हैं ज़र्द सब पत्ते,
पुरानी नाव लेकर क्यों, किनारों को बुलाते हो

कली चटकी नहीं कोई, नहीं है “रूप” का गुलशन
पड़ी वीरान महफिल में, अशआरों को बुलाते हो
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

5 टिप्‍पणियां:

  1. कब्र में पैर लटके हैं, हुए हैं ज़र्द सब पत्ते,
    पुरानी नाव लेकर क्यों, किनारों को बुलाते हो.......लाज़वाब

    उत्तर देंहटाएं
  2. ग़मों की ओड़कर चादर, बहारों को बुलाते हो
    बिना मौसम के धरती पर, नजारों को बुलाते हो

    गगन पर सूर्य का कब्जा, नहीं छायी कहीं बदली
    बड़े नादान हो दिन में, सितारों को बुलाते हो

    नहीं चिट्ठी-नहीं पत्री, नहीं मौसम सुहाना है
    बिना डोली सजाये ही, कहारों को बुलाते हो

    कब्र में पैर लटके हैं, हुए हैं ज़र्द सब पत्ते,
    पुरानी नाव लेकर क्यों, किनारों को बुलाते हो

    कली चटकी नहीं कोई, नहीं है “रूप” का गुलशन
    पड़ी वीरान महफिल में, अशआरों को बुलाते हो
    (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    सुन्दर सांगीतिक भावपूर्ण रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह.;क्‍या बात है...बहुत खूब लि‍खा आपने.;बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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