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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

"ग़ज़ल-असली 'रूप' दिखाता दर्पण," (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पथ उनको क्या भटकायेगा, जो अपनी खुद राह बनाते
भूले-भटके राही को वो, उसकी मंजिल तक पहुँचाते

अल्फाज़ों के चतुर चितेरे, धीर-वीर-गम्भीर सुख़नवर
जहाँ न पहुँचें सूरज-चन्दा, वो उस मंजर तक हो आते

अमर नहीं है काया-माया, लेकिन शब्द अमर होते हैं
शब्द धरोहर हैं समाज की, दिशाहीन को दिशा दिखाते

विरह-व्यथा की भट्टी में, जब तपकर शब्द निकलते हैं
पाषाणों के भीतर जाकर, वो सीधे दिल को छू जाते

चाहे ग़ज़ल-गीत हो, या फिर दोहा या रूबाई हो
वजन बराबर हो तो, अपना असर बराबर दिखलाते

असली “रूप” दिखाता दर्पण, जो औकात बताता सबको
जो काँटों में पले-बढ़े हैं, वो ही तो गुलशन महकाते

3 टिप्‍पणियां:

  1. अमर नहीं है काया-माया, लेकिन शब्द अमर होते हैं
    शब्द धरोहर हैं समाज की, दिशाहीन को दिशा दिखाते
    bahut khoob .badhai

    उत्तर देंहटाएं

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