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मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

"ग़ज़ल-सभ्यता के हिमालय पिघलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आदमी के इरादे बदलने लगे
दीन-ईमान पल-पल फिसलने लगे

चल पड़ी गर्म अब तो हवाएँ यहाँ
सभ्यता के हिमालय पिघलने लगे

फूल कैसे खिलेंगे चमन में भला,
लोग मासूम कलियाँ मसलने लगे।

अब तो पूरब में सूरज लगा डूबने
पश्चिमी रंग में लोग ढलने लगे

देख उजले लिबासों में मैले मगर
शान्त सागर के आँसू निकलने लगे

दूध माँ का लजाने लगे पुत्र अब
मूँग जननी के सीने पे दलने लगे

नेक सीरत पे अब कौन होगा फिदा
 “रूप” को देखकर दिल मचलने लगे

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत खूब ......हमेशा कुछ नया पढ़ने को मिलता है

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह .. लाजवाब गज़ल ... हर शेर में नया अंदाज़ ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. दूध माँ का लजाने लगे पुत्र अब
    मूँग जननी के सीने पे दलने लगे

    नेक सीरत पे अब कौन होगा फिदा
    “रूप” को देखकर दिल मचलने लगे

    अति संवेदन संसिक्त सशक्त विडंबन हमारे वक्त का। शानदार प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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