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रविवार, 23 नवंबर 2014

"गीत-क़लम मचल जाया करती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जब कोई श्यामल सी बदली,
सपनों में छाया करती है!
तब मेरे मन में शब्दों की,
माला बन जाया करती है!!

निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना-विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
माला बन जाया करती है!!

अन्तस से जो शब्द निकलते,
शोला बनकर आग उगलते,
चिंगारी जब धधक उठे तो,
ज्वाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
क़लम मचल जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

वैरी ने  हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

6 टिप्‍पणियां:

  1. दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    दर्पण दिखलाने को मेरी,
    क़लम मचल जाया करती है!
    माला बन जाया करती है!!
    बहुत सुंदर...

    उत्तर देंहटाएं
  2. जब कोई श्यामल सी बदली,
    सपनों में छाया करती है!
    तब मेरे मन में शब्दों की,
    माला बन जाया करती है!!

    सुंदरम मनोहरं। सदैव की तरह सशक्त स्वर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर शब्दों से सजाया है आपने मन के भावों को |

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ... मधुर गीत ... शब्दों का सुन्दर ताना बाना ...

    उत्तर देंहटाएं

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