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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

"गीत-सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हार में है छिपा जीत का आचरण।
सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।

बात कहने से पहले विचारो जरा
मैल दर्पण का अपने उतारो जरा
तन सँवारो जरा, मन निखारो जरा
आइने में स्वयं को निहारो जरा
दर्प का सब हटा दीजिए आवरण।
सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।

मत समझना सरल, ज़िन्दग़ी की डगर
अज़नबी लोग हैं, अज़नबी है नगर
ताल में जोहते बाट मोटे मगर
मीत ही मीत के पर रहा है कतर
सावधानी से आगे बढ़ाना चरण।
सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।

मनके मनकों से होती है माला बड़ी
तोड़ना मत कभी मोतियों की लड़ी
रोज़ आती नहीं है मिलन की घड़ी
तोड़ने में लगी आज दुनिया कड़ी
रिश्ते-नातों का मुश्किल है पोषण-भरण।
सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।

वक्त की मार से तार टूटे नहीं
भीड़ में मीत का हाथ छूटे नहीं
खीर का अब भरा पात्र फूटे नहीं
लाज लम्पट यहाँ कोई लूटे नहीं
प्रीत के गीत से कीजिए जागरण
सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भावपूर्ण और सुन्दर प्रस्तुति....

    उत्तर देंहटाएं
  2. सशक्त सन्देश देता सुन्दर बिम्ब प्रधान गीत :

    मनके मनकों से होती है माला बड़ी
    तोड़ना मत कभी मोतियों की लड़ी

    उत्तर देंहटाएं
  3. कल 06/नवंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  4. Sikhiye pyar se pyar ka vyakaran.... Bahut hi umda gahre bhaaw saarthak prastuti !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 6-11-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1789 में दिया गया है
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  7. हार में है छिपा जीत का आचरण।
    सीखिए प्यार से, प्यार का व्याकरण।।
    सुन्दर शब्द रचना.....
    http://savanxxx.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं

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