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बुधवार, 26 नवंबर 2014

"साँस की डोर-देवदत्त 'प्रसून' " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।

कवि देवदत्त "प्रसून" आज हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनका साहित्य अमर रहेगा।
--

डोर तुम्हारे हाथों में (देवदत्त प्रसून)

मेरी साँस की  डोर  तुम्हारे  हाथों  में  ।
है  दामन  का  छोर  तुम्हारे हाथों  में ।।

प्यासा  जैसे रहा  हो  कोई सावन में  -
खडा  लिये  उम्मीद  जैसे   आँगन  में  ।।
तुम  आये  मन  भीग  उठा, आनन्द मिला -
मैं हूँ  हर्ष विभोर, प्रेम सौगातों   में  ।
नाच  उठे ज्यों मोर सघन बरसातों में ।।1।।

लम्बी बिरह के बाद  तुम्हारी  पहुनाई ।
जैसे बादल  हटे पूर्णिमा  खिल  आयी  ।।
बिखरा  सुन्दर  हास,धरा के आँचल में  -
ज्यों  खुश  हुए  चकोर , चाँदनी रातों में ।।2।।

मिलन  की वीण से पीडित मन बहलाओ  ।
तार   प्यार  के  धीरे  धीरे   सहलाओ  ।। 
अँगुली  का  वरदान   जगे  मीठी सरगम ।
छुपे  हैं मीठे  शोरमधुर आघातों    में   ।
डूबी  हर  टंकोर ,मृदुल   सुर सातों  में   ।।3।।

मैंने   मन की  कह ली, तुम भी बोलो तो  ।
मेरे  कानों में भी मधु रस घोलो तो   ।।
है  मिठास मिसरी  सी कितनी स्वाद  भरी -
हे  प्रियतम  चितचोर , तुम्हारी  बातों में  ।
सुख मिल गयाअथोर ,स्नेह के नातों में  ।।4 ।।

"प्रसून "तेरी  याद  इस तरह मन में  है  -
मीठी मीठी गन्ध  महकती सुमन में है  ।।
कोई सुन्दर मोती  मानों सीप में  हो  -
उतरे  जैसे  हंस  बगुल  की  पाँतों  में  ।
या  शबनम  की  बूँद कमल  की पाँतों में।।5।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. विनम्र श्रद्धाँजलि। एक उच्च कोटि के कवि ब्लागर के साथ हमने एक अच्छा पाठक भी खो दिया ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इतनी सुन्दर रचना किसी प्रबुद्ध आत्मा की ही हो सकती है ,उन्हें देरों नमन

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रस्तुति
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. "प्रसून "तेरी याद इस तरह मन में है -
    मीठी मीठी गन्ध महकती सुमन में है ।।
    कोई सुन्दर मोती मानों सीप में हो -
    उतरे जैसे हंस बगुल की पाँतों में ।
    या शबनम की बूँद कमल की पाँतों में।।5।।
    श्रधांजलि

    उत्तर देंहटाएं

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