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रविवार, 9 नवंबर 2014

"गीत-मतलब की सब दुनियादारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आपाधापी की दुनिया में,
मतलब की सब दुनियादारी।
दुनियादारी के मेले में,
आज बन गये सब व्यापारी।।
बिना काम के नहीं किसी को,
कोई याद किया करता है,
अमृत पाने के लालच में ,
गरल गाँठ में भरता है,
स्वार्थ पड़ा है सब पर भारी।
दुनियादारी के मेले में,
आज बन गये सब व्यापारी।।
मानवता के इस दंगल में,
केवल दाँव-पेंच चलते हैं,
धनवानों की घुड़सालों में,
बलशाली घोड़े पलते हैं,
पश्चिम की असभ्य आँधी से,
पूरब की पुरवा है हारी।
दुनियादारी के मेले में,
आज बन गये सब व्यापारी।।
सजे-धजे परिधान छोड़कर,
अंगों का हो रहा प्रदर्शन,
सोच हो गयी आज घिनौनी,
घटा रूप” का सब आकर्षण,
भूल गये हैं शब्द लाज का,
फैशन की पनपी बीमारी।
दुनियादारी के मेले में,
आज बन गये सब व्यापारी।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. ढ़िया रहा चर्चा मंच। हमारे सेतु को खपाने के लिए आभार। बहुत सुन्दर रचना है :

    सजे-धजे परिधान छोड़कर,
    अंगों का हो रहा प्रदर्शन,
    सोच हो गयी आज घिनौनी,
    घटा “रूप” का सब आकर्षण,
    भूल गये हैं शब्द लाज का,
    फैशन की पनपी बीमारी।
    दुनियादारी के मेले में,
    आज बन गये सब व्यापारी।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बढ़िया रहा चर्चा मंच। हमारे सेतु को खपाने के लिए आभार। बहुत सुन्दर रचना है :

    सजे-धजे परिधान छोड़कर,
    अंगों का हो रहा प्रदर्शन,
    सोच हो गयी आज घिनौनी,
    घटा “रूप” का सब आकर्षण,
    भूल गये हैं शब्द लाज का,
    फैशन की पनपी बीमारी।
    दुनियादारी के मेले में,
    आज बन गये सब व्यापारी।।

    उत्तर देंहटाएं

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