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रविवार, 12 अप्रैल 2015

"भारत माँ का कर्ज चुकाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
कई वर्ष पहले यह गीत रचा था!
इसको बहुत मन से समवेत स्वरों में 
मेरी मुँहबोली भतीजियों 
श्रीमती अर्चना चावजी  और उनकी छोटी बहिन 
रचना बजाज ने गाया है।
आप भी इस गीत का आनन्द लीजिए!
तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

राम-कृष्ण, गौतम, गांधी की हम ही तो सन्तान है,
शान्तिदूत और कान्तिकारियों की हम ही पहचान हैं।
ऋषि-मुनियों की गाथा को, दुनिया भर में गुंजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

उनसे कैसा नाता-रिश्ता? जो यहाँ आग लगाते हैं,
हरे-भरे उपवन में, विष के पादप जो पनपाते हैं,
अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,
ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,
हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,
हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,
भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?
आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?
मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर गीत ... ओजस्वी स्वर दिया है इसे अर्चना जी और रचना जी ने ...
    देश प्रेम से ओत-प्रोत गीत ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर गीत
    जय हिन्द!

    उत्तर देंहटाएं
  3. जनमन के आशंकित मन में फिर विश्वाश जगाना है ,

    कुल राष्ट्रों के संकुल में भारत सिरमौर बनाना है।

    सुन्दर रचना अपने शाश्त्री जी की। बधाई आदरणीय भाई साहब।

    एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :

    आप भी इस गीत का आनन्द लीजिए!
    तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    राम-कृष्ण, गौतम, गांधी की हम ही तो सन्तान है,
    शान्तिदूत और कान्तिकारियों की हम ही पहचान हैं।
    ऋषि-मुनियों की गाथा को, दुनिया भर में गुंजाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    उनसे कैसा नाता-रिश्ता? जो यहाँ आग लगाते हैं,
    हरे-भरे उपवन में, विष के पादप जो पनपाते हैं,
    अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,
    ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,
    हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,
    हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,
    भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?
    आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?
    मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर और प्रेरक गीत

    उत्तर देंहटाएं

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