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शनिवार, 18 अप्रैल 2015

"नीम की छाँव नहीं रही" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जाने कहाँ खो गया अपनाआज पुराना गाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।

घर-घर में हैं टैलीवीजिनसूनी है चौपाल,
छाछ-दूध-नवनीत न भाताचाय पियें गोपाल,
भूल गये नाविक के बच्चे, आज चलानी नाव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।

पहले जैसा निश्छल बचपन, नहीं दिखाई देता,
मन्दिर में अब कथा-कीर्तन, नहीं सुनाई देता,
पूजा-पध्दति की सी.डी. ने, तोड़ दिये हैं पाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।

नहीं रहे अब खेल पुराने, दंगल-कुश्ती भूले,
जिम में जाकर अब यौवन के हाथ-पाँव हैं फूले,
मस्तक पर छायी है चर्बी, भूल गये सब दाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
पशुशाला में बैलों के, अब खूँटे हैं सब खाली,
खाद न हो गोबर की तो, लगती कृत्रिम हरियाली?
"रूप" हंस का भर कर बगुले बैठे हैं हर ठाँव
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha ....neem ki chanv naa rahi ..घर-घर में हैं टैलीवीजिन, सूनी है चौपाल,
    छाछ-दूध-नवनीत न भाता, चाय पियें गोपाल,

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपका दर्द आपकी रचनाओं में उभर के आ रहा है ... आशा है अप जल्दी इस दुःख से बाहर आयें ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. हाँ, सब कुछ अब बदल गया है. सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय ,
    सादर नमन।
    नीम की छाँव............ एक लम्बी साँस भरकर सिर्फ़ याद ही किया जा सकता है वो सब।
    सच वो पेड़ पौधे हरियाली गुम हैं अब तो…… मेरा बचपन तो अनगिनत पेड़ पौधों के
    बीच बीता है आदरणीय। संभव हो तो मेरे ब्लॉग्स पर पधारकर अपना मार्गदर्शन रुपी
    आशीर्वाद प्रदान कीजियेगा।
    http://lekhaniblog.blogspot.in/ एक लेखनी मेरी भी
    http://lekhaniblogdj.blogspot.in/नारी का नारी को नारी के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  5. अपने दर्द को अक्षरों में लपेट कर इस तरह बताया है की आँखें नम हो जाय

    उत्तर देंहटाएं
  6. कवी ही युग की पीड़ा जीता है, इस कथन को अपने चरितार्थ किया है सर।
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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